ओम् नम: शिवाय | जय भोलेनाथ | जय बाबा भावरनाथ | जय माता दी | भौरासा नगर मे आपका स्वागत है..

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माँ चामुंडा की नगरी देवास से १६ किलोमीटर दूर भोपाल रोड पर स्थित नगर भौंरासा अतीत के अनेक पौराणिक, पुरातत्वीय, एतिहासिक एवं चमत्कारी सिद्ध स्थानों को अपने मे समेटा हुआ है |
यह बड़ी सी आबादी वाला क़स्बा है जहा बड़े आक्रताओ के हमले के बावजूद आज भी प्राचीन मानबिन्दु मौजुद है पौराणिक काल के राजा नल और दयमंती के नाम के तालाब और उनके द्वारा स्थापित शिव मूर्ति आज भी यहाँ है |
भौंरासा  के इस प्राचीन मंदिर के बारे मे मान्यता है की यह राजा नल और रानी दयमंती के द्वारा स्थापित किया गया है जब राजा नल कलयुग के दुर्भाव के कारण पुत्कार से जुए मे आपना राज्य एवं धन संपत्ति हार गए और केवल एक मात्र वस्त्र धारण कर अपनी पत्नी के साथ वन मे भूखे – प्यासे भटक रहे थे तभी एक स्थान पर पहाडियों के समीप छोटे से एक गड्डे मे पानी देखा व हाथ मुह धोकर अपनी प्यास बुझाई | राजा नल की सारी भूख-प्यास और थकावट इस जल से दूर हो गई, आश्चर्य चातिक हो कर उन्होंने इस जल का महत्त्व जाना व उसी समय उन्होंने तय कर लिया कि अपने दुर्दिन उदय होने पर यहां जलाशय का निर्माण कराएंगे। जिससे कि जल का लाभ जनसाधारण ही उठा सके।

पौराणिक कथा के अनुसार कटोटक नाग के बीम से कलयुग ने राजा नल के शरीर को त्यागा व् उन्होंने एक अन्य राजा से दुर्थ विद्या प्राप्त कर पुन: जुआं खेला व अपना राज्य जीत लिया। तब राजा ने उस जलाशय का निर्माण कराया। यह स्थान देवास से 8 किलोमीटर दूर जामगोद की पहाड़ियों के पीछे है। रानी की वीरह की याद में रानी के कहने पर एक अन्य तालाब का निर्माण करवाने का निर्णय लिया, जो वर्तमान में भौरासा नगर में स्थित है। जिसका नाम दयमंती तालाब रखा। तालाब की खुदाई एक साथ प्रारंभ हुई लेकिन पानी दयमतीं तालाब में पहले निकला। राजमहल में जब राजा ने रानी से पूछा कि आपके तालाब में पानी कितना निकला इस पर रानी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि महाराज अभी कहा पानी निकला है। रानी के इस झूठ को देख राजा ने रानी से कहा कि अब आपके तालाब में पानी नहीं टिकेगा। यह सत्य है कि रानी के तालाब में वर्षभर पानी नहीं रहता। वह सूख जाता है लेकिन राजा के तालाब में वर्षभर पानी रहता है। इन दोनों के तालाबों के मध्य आज भी वीरह की दूरी एवं मिलन की अपार स्नेह गाथा परीलक्षित है।

जब वर्षा के दौरान राजा नल का तालाब पूरी तरह भर जाता है तो उसका जल बह कर पांच किलोमीटर दूर दयमंती तालाब में आकर मिलता है। दोनों तालाबों के पानी मिलने से राजा-रानी के स्नेह मिलन की गाथा स्मरण हो जाती है।

चमत्कारी प्रतिमा पर गंडासे का निशान




मनकामेश्वर मंदिर में स्थािपत प्रतिमा बढ़ी चैतन्य और चमत्कारी है।कहा जाता है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने मालवा मध्यप्रदेश पर हमला किया और भारी लूटपाट मचाई। यहां के सभी मंदिरों को ध्वसत कर दिया। मनकामेश्वर मंदिर को भी उसने तोड़-फोड़ दिया तथा शिवजी की पिंडी पर गंडासे से घातक प्रहार किया , प्रहार करते है पाषाण की पिंडी मे गंडासा गहरा धंस गया और उसमें से खून की धारा बहने लगी । यह घटना देख औरंगजेब भय के कारण कपने लगा और वहा से भाग निकला।

प्रमाण के तौर पर उक्त शिव पिंडी पर आज भी घाव का गहरा निशान दिखाई देता है। लोगों का दावा है कि पूर्व में यह निशान गहरा था परंतु समय के साथ घाव का कटाव भरता दिखाई देता है।


पुरातत्वीय सामग्री का पाया जाना 
भौंरासा मे भंवरनाथ मंदिर के आसपास आज भी पाषाण युग और परमकाल के अवशेष बिखेरे पड़े है। कई महत्वपूर्ण स्थानों पर अतिक्रमणकारियो  ने अवेध कब्जा कर पुरातत्वीय महत्व की सामग्री को नष्ट किया है। पुरातत्वेता श्री वाकणकर ने कई वर्ष पूर्व इस स्थान के पुरातत्वीय महत्व से शासन और प्रशासन को अवगत करा दिया था लेकिन लालफीताशाही में श्री वाकणकर की रिपोर्ट किसी सरकारी फाइलों में दफन हो चुकी है। 

भक्त भंवरनाथ ने जीवित समाधी ली 
प्राचीन समय में इस स्थान पर परम भक्त भंवरसिंह आए और यहां भक्ति साधना करने लगे। भक्त भंवरसिंह ने नाथ संप्रदाय की साधना पद्धति अपनाई और उनके मन ईश्वर में ऐसा एकाकार हुआ की विक्रम संवत् 880 से 1000 के मध्य उन्होंने मनकामेश्वर मंदिर के निकट जीवित समाधि ले ली। जहां आज भी प्रतिमा स्थािपत है। इस मंदिर का रास्ता संकरा एवं गहराई का है। जहां अंदर जाने पर मन को अर्थाह शांति प्राप्त होती है। कई साधकों का कहना है कि इस स्थान पर बैठकर ध्यान एवं योग को काफी शीघ्रता से प्राप्त किया जा सकता है।
 भक्त भंवरनाथ द्वारा साधना प्राप्त करने एवं जीवित समाधि लेने के कारण वह भंवरनाथ कहलाए। जिनकी गिनती 9 नाथों में की जाती है। आज भी यहां आने वाले श्रद्धालु भक्त भंवरनाथ को इतना सम्मान देते है कि पहले भक्त भंवरनाथ के दर्शन करने जाते और बाद में मनकामेश्वर मंदिर में दर्शन करते है। इस संपूर्ण स्थान को श्री भंवरनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है व कालांतर में भंवरनाथ के कारण ही इस कस्बे का नाम भंवरासा या भौरासा पड़ा। 

सती माता की समाधी 
मंदिर के पार्श्व में स्थित एक छतरी में सती माता की समाधि है। जिसके अंदर सती एवं उनके पति की मूर्ति स्थािपत है। इसके आसपास मनोरम बगीचा है। इस संबंध में एक बुजुर्ग व्यक्ति सीताराम वर्मा ने जानकारी देकर बताया कि करीब 300 वर्ष पूर्व कुमावत समाज की एक महिला अपने पति की मृत्यु हो जाने पर स्वयं की चिता में जलकर सती हो गई। सती माता के वस्त्र आज भी मंदिर स्थल पर सुरक्षित मौजूद है। इसके अलावा इस स्थान पर दो अन्य महिलाएं भी सती हुई थी। उनकी समाधि भी यहां बनी हुई है। 
 तालाब पर दो संत पुरुषों की समािध भी  बनी हुई जिन्होंने यहाँ समाधी ली  तथा तालाब के किनारे शक्ति माता या सरोवरी माता का मंदिर स्थािपत है। जहां नवरात्रि के समय भारी जनसैलाब दर्शन प्राप्त करने पहुंचता है। जो नगर का एक प्रमुख मंदिर है। 

विध्वंश की दास्ता है भौंरासा  
औरंगजेब द्वारा भौंरासा पर जब हमला किया गया तब यह एक व्यापारिक केन्द्र व सम्रद्ध नगर था यहाँ सिर्फ मनकामनेश्वर का मंदिर ही क्षतिग्रस्त नहीं हुआ , वरन एक विशाल जैन मंदिर को भी नष्ट किया गया, जिसके अवशेष आज भी भौंरासा मे दबे हुए है | यहाँ आस पास मे ही एक सनातन मंदिर था इसे भी नष्ट किया गया इस मंदिर के चार पाषाण स्तम्ब आज भी खड़े दिखाई देते है | वही मनकामनेश्वर मंदिर के आस पास परमार कालीन पाषाण शिल्प के अवशेष बिखरे पड़े है कहा जाता है की इस मंदिर का जीर्णोधार राजा विक्रमादित्य, परम एवं मराठा शासकों ने किया १६०० वर्ष पूर्व भागवत सेठ नमक व्यापारी ने इस मंदिर का नव निर्माण कराया, ऐसा शिला लेख यहाँ मिला है

पाषाण युग के अवशेष मिले थे डॉ. वाकणकर को
भौंरासा के निवासी वैध लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया की वो पुरातत्वेता पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर को भौंरासा लेकर आये थे | उन्होंने मंदिर पर स्थित शिलालेख की प्राचीन लिपि पड़कर पुरातत्वीय जानकारी प्राप्त की | वही तालाब के पास खेत मे पड़े अवशेष को खोज कर एकत्र किया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ की प्राचीन काल मे यहाँ एक महल था, इसके साथ ही उन्होंने सनातनी मंदिर के ध्वस्त मे से एक सूर्य की प्राचीन प्रतिमा खोज कर निकली

सिद्ध चमत्कारी कुण्ड
भंवरनाथ मंदिर के ठीक पीछे स्थित एक प्राचीन कुण्ड है जिसका जल चमत्कारी है सिद्धकुण्ड के पानी का रंग सुबह सफ़ेद, दोपहर कला एवं शाम के वक्त पीला दिखाई देता है इस जल चमत्कार यह है की जिस स्त्री या गौमाता को दूध नहीं उतरता तो कुण्ड मात्र का पानी छिडकने से ही दूध आने लगता है , शायद रानी दयमंती के मातृत्व के प्रभाव से यह संभव हो | इसके अलावा इस कुण्ड के पानी से अनेक रोग व बीमारी ठीक होती है परन्तु कुछ समय पूर्व इस कुण्ड का थाल धसने से यह बंद हो गया | प्रयास करके इसे पुनः ठीक किया जा सकता है |

सतादेव भी मौजुद है
मंदिर के ओटले पर एक पत्थर पर सतदेव की प्रतिमा मौजुद है किसी लोक कलाकार द्वारा घोड़े पर वीर पुरुष बनाया गया हा जिसके हाथ मे तलवार एवं ढाल है उक्त वीर पुरुष किसी युद्ध मे शहीद हो गया था जिन्हें स्थानीय बोली मे सतादेव कहा जाता है | इनकी स्मृति मे समाधी बनाई गई लेकिन समाधी नष्ट होने से वहाँ की प्रतिमा को मंदिर के पास रख दिया गया |

त्रिम्बकपुरी महाराज की प्रज्वलित धुनी
मंदिर के प्रांगण मे ही स्थित श्री श्री १००८ त्रिम्बकपुरी महाराज ने लंबे समय तक यहाँ रहकर अपनी तपस्या की थी, उनके द्वारा प्रज्जवलित धुनी आज भी कायम है | धुनी पर उपस्थित संत ने बताया की इन महाराज की इंदौर के पास केवडेश्वर मंदिर पर भी गादी है

बाबा भंवरनाथ के प्रति युवाओ की आस्था
नगर के धार्मिक जन मानस द्वारा हर वर्ष कावड़ यात्रा का आयोजन किया जा रहा  है, कावड़यात्री ओंकारेश्वर से माँ नर्मदे का पवित्र जल भरकर बाबा भंवरनाथ और मनकामनेश्वर भगवान का जल अभिषेक करते है साथ ही मंदिर मे पावन ग्रन्थ रामायण का अखंड पाठ किया जाता है बाबा भंवरनाथ के भक्तो व नगरवासियों के सहयोग द्वारा बाबा भंवरनाथ की पीतल जलधारी परिवर्तित करके चांदी की जलधारी स्थापित की गई है |


अगर कुछ जानकरी अधूरी है या गलत है और आपको उस जानकारी का सही ज्ञान है तो कृपया मार्गदर्शन अवश्य करे  |

धन्यवाद
जय भोलेनाथ
  


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